Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 11.25 / 60

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)11.25

11.25
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि । दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ ११-२५ ॥
daṃṣṭrākarālāni ca te mukhāni dṛṣṭvaiva kālānalasannibhāni | diśo na jāne na labhe ca śarma prasīda deveśa jagannivāsa || 11-25 ||
— और दाढ़ों से विकराल आपके मुखों को ; — देखकर ही, प्रलयाग्नि के समान ; — मैं दिशाओं को नहीं जानता, शरण नहीं पाता ; — प्रसन्न होइए, हे देवेश, हे जगन्निवास

दाढ़ों से विकराल और प्रलयाग्नि के समान आपके मुखों को देखकर ही मैं दिशाओं को नहीं जानता और शरण नहीं पाता; हे देवेश, हे जगन्निवास, प्रसन्न होइए।