Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 11.20 / 60

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)11.20

11.20
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः । दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदृ ग्लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥ ११-२० ॥
dyāvāpṛthivyoridamantaraṃ hi vyāptaṃ tvayaikena diśaśca sarvāḥ | dṛṣṭvādbhutaṃ rūpamugraṃ tavedṛ glokatrayaṃ pravyathitaṃ mahātman || 11-20 ||
— क्योंकि द्यौ-पृथ्वी के बीच का यह अन्तराल ; — आप अकेले से व्याप्त, और समस्त दिशाएँ ; — आपके इस अद्भुत, उग्र रूप को देखकर ; — तीनों लोक व्यथित हैं, हे महात्मन्

द्यौ और पृथ्वी के बीच का यह अन्तराल और समस्त दिशाएँ आप अकेले से ही व्याप्त हैं; हे महात्मन्, आपके इस अद्भुत और उग्र रूप को देखकर तीनों लोक व्यथित हो उठे हैं।