Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 11.19 / 60

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)11.19

11.19
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य- मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् । पश्यामि त्वा दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥ ११-१९ ॥
anādimadhyāntamanantavīrya- manantabāhuṃ śaśisūryanetram | paśyāmi tvā dīptahutāśavaktraṃ svatejasā viśvamidaṃ tapantam || 11-19 ||
— आदि-मध्य-अन्तरहित, अनन्त वीर्य वाले ; — अनन्त भुजाओं वाले, चन्द्र-सूर्य रूपी नेत्रों वाले ; — मैं आपको देखता हूँ, प्रज्वलित अग्नि-मुख वाले ; — अपने तेज से इस विश्व को तपाते हुए

आदि, मध्य और अन्त से रहित, अनन्त वीर्य वाले, अनन्त भुजाओं वाले, चन्द्र और सूर्य रूपी नेत्रों वाले आपको मैं देखता हूँ — प्रज्वलित अग्नि के समान मुख वाले, अपने तेज से इस विश्व को तपाते हुए।