Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 11.18 / 60

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)11.18

11.18
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् । त्वमव्ययः सात्त्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥ ११-१८ ॥
tvamakṣaraṃ paramaṃ veditavyaṃ tvamasya viśvasya paraṃ nidhānam | tvamavyayaḥ sāttvatadharmagoptā sanātanastvaṃ puruṣo mato me || 11-18 ||
— आप अक्षर, परम जानने योग्य ; — आप इस विश्व के परम निधान ; — आप अव्यय, सनातन धर्म के रक्षक ; — आप सनातन पुरुष, ऐसा मेरा मत

आप अक्षर, परम जानने योग्य हैं; आप इस विश्व के परम निधान हैं; आप अव्यय, सनातन धर्म के रक्षक हैं; आप सनातन पुरुष हैं — ऐसा मेरा मत है।