Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 11.21 / 60

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)11.21

11.21
अमी हि त्वा सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति । स्वस्तीति चोत्तचैव महर्षिसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥ ११-२१ ॥
amī hi tvā surasaṅghā viśanti kecidbhītāḥ prāñjalayo gṛṇanti | svastīti cottacaiva maharṣisaṅghāḥ stuvanti tvāṃ stutibhiḥ puṣkalābhiḥ || 11-21 ||
— ये देवगण आप में प्रवेश करते हैं ; — कुछ भयभीत हाथ जोड़कर स्तुति करते हैं ; — 'स्वस्ति' कहते हुए महर्षियों के समूह ; — आपकी विपुल स्तुतियों से स्तुति करते हैं

ये देवगण आप में प्रवेश करते हैं; कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़कर स्तुति करते हैं; और 'स्वस्ति हो' ऐसा कहते हुए महर्षियों के समूह विपुल स्तुतियों से आपकी स्तुति करते हैं।