Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 10.11 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)10.11

10.11
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः । नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥ १०-११ ॥
teṣāmevānukampārthamahamajñānajaṃ tamaḥ | nāśayāmyātmabhāvastho jñānadīpena bhāsvatā || 10-11 ||
— उन पर ही अनुकम्पा के लिए ; — मैं अज्ञान से उत्पन्न अन्धकार को ; — नष्ट करता हूँ, उनके आत्म-भाव में स्थित ; — ज्ञान के देदीप्यमान दीपक से

उन पर ही अनुकम्पा के लिए, उनके आत्म-भाव (अन्तःकरण) में स्थित होकर, मैं अज्ञान से उत्पन्न अन्धकार को ज्ञान के देदीप्यमान दीपक से नष्ट कर देता हूँ।