Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 1.10 / 47

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)1.10

1.10
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीमाभिरक्षितम् । पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीष्माभिरक्षितम् ॥ १-१० ॥
aparyāptaṃ tadasmākaṃ balaṃ bhīmābhirakṣitam | paryāptaṃ tvidameteṣāṃ balaṃ bhīṣmābhirakṣitam || 1-10 ||
— अपरिमित, पूर्णतः नापा न जा सके ; — वह हमारा ; — बल ; — भीम के द्वारा रक्षित ; — परिमित, सीमित ; — किन्तु यह इनका ; — भीष्म के द्वारा रक्षित

भीष्म के द्वारा रक्षित हमारा वह बल अपरिमित है, जबकि भीम के द्वारा रक्षित इनका यह बल परिमित है।