The Great Liberation Tantra· 3.90 / 153

The Great Liberation Tantra3.90

3.90
यत्र कुत्र स्थितो वापि प्राप्य ब्रह्मार्पितामृतम् । गृहीत्वा कीकशो वाऽपि ब्रह्मसायुज्यमाप्नुयात् ॥९०॥
yatra kutra sthito vāpi prāpya brahmārpitāmṛtam | gṛhītvā kīkaśo vā'pi brahmasāyujyamāpnuyāt ||90||
— कहीं भी ; — किसी स्थान में ; — स्थित ; — अथवा ; — पाकर ; — ब्रह्म-अर्पित अमृत को ; — ग्रहण करके ; — दुर्बल, क्षीण ; — भी ; — ब्रह्म-सायुज्य को ; — प्राप्त करे

कहीं भी स्थित होकर, ब्रह्म-अर्पित अमृत को पाकर और ग्रहण करके, कोई दुर्बल मनुष्य भी ब्रह्म-सायुज्य प्राप्त कर लेता है।