The Great Liberation Tantra· 3.91 / 153

The Great Liberation Tantra3.91

3.91
यदि स्यान्नीचजातीयमन्नं ब्रह्मणि भावितम् । तदन्नं ब्राह्मणैर्ग्राह्यमपि वेदान्तपारगैः ॥९१॥
yadi syānnīcajātīyamannaṃ brahmaṇi bhāvitam | tadannaṃ brāhmaṇairgrāhyamapi vedāntapāragaiḥ ||91||
— यदि ; — नीच-जातीय हो ; — अन्न ; — ब्रह्म में ; — भावित ; — वह अन्न ; — ब्राह्मणों द्वारा ग्राह्य ; — भी ; — वेदान्त के पारगामियों द्वारा

यदि अन्न नीच-जातीय (मूल का) हो, और ब्रह्म में भावित (किया गया) हो, तो वह अन्न ब्राह्मणों द्वारा भी — वेदान्त के पारगामियों द्वारा भी — ग्रहण करने योग्य है।