The Great Liberation Tantra· 3.47 / 153

The Great Liberation Tantra3.47

3.47
शनैःशनैस्त्यजेद्वायुं जपन् षोडशधा मनुम् । वामनासापुटेऽप्येवं पूरकुम्भकरेचकम् ॥४७॥
śanaiḥśanaistyajedvāyuṃ japan ṣoḍaśadhā manum | vāmanāsāpuṭe'pyevaṃ pūrakumbhakarecakam ||47||
— धीरे-धीरे ; — वायु का त्याग करे ; — जपते हुए ; — सोलह बार ; — मन्त्र को ; — वाम नासिका-पुट में भी ; — इसी प्रकार ; — पूरक, कुम्भक और रेचक

मन्त्र को सोलह बार जपते हुए, धीरे-धीरे वायु का त्याग करे; वाम नासिका-पुट में भी इसी प्रकार पूरक, कुम्भक और रेचक (करे)।