The Great Liberation Tantra· 3.46 / 153

The Great Liberation Tantra3.46

3.46
अङ्गुष्ठेन दक्षनासां धृत्वा कुम्भकयोगतः । जपेद्द्वात्रिंशताऽवृत्त्या ततो दक्षिणनासया ॥४६॥
aṅguṣṭhena dakṣanāsāṃ dhṛtvā kumbhakayogataḥ | japeddvātriṃśatā'vṛttyā tato dakṣiṇanāsayā ||46||
— अंगुष्ठ से ; — दक्षिण नासिका को ; — बन्द करके ; — कुम्भक-योग से ; — बत्तीस बार जपे ; — आवृत्ति में ; — फिर ; — दक्षिण नासिका से

अंगुष्ठ से दक्षिण नासिका को बन्द करके, कुम्भक-योग से बत्तीस आवृत्तियों के साथ (मन्त्र को) जपे; फिर दक्षिण नासिका से,