The Great Liberation Tantra· 3.28 / 153

The Great Liberation Tantra3.28

3.28
न तस्य दुरितं किञ्चिद्ब्रह्मनिष्ठस्य देहिनः । सत्यपूतस्य शुद्धस्य सर्वप्राणिहितस्य च । को वोपद्रवमन्विच्छेदात्मापघातकं विना ॥२८॥
na tasya duritaṃ kiñcidbrahmaniṣṭhasya dehinaḥ | satyapūtasya śuddhasya sarvaprāṇihitasya ca | ko vopadravamanvicchedātmāpaghātakaṃ vinā ||28||
— नहीं ; — उसका ; — दुरित, अनिष्ट ; — कोई ; — ब्रह्म में निष्ठावान् के ; — देही के ; — सत्य से पूत के ; — शुद्ध के ; — समस्त प्राणियों के हितकारी के ; — और ; — कौन ; — अथवा ; — उपद्रव को ; — चाहेगा ; — आत्मघाती को ; — छोड़कर

ब्रह्म में निष्ठावान्, सत्य से पूत, शुद्ध, समस्त प्राणियों के हितकारी उस देही का कोई दुरित (अनिष्ट) नहीं होता; और अपना घात करने वाले को छोड़कर, कौन उस पर उपद्रव करना चाहेगा?