न तस्य दुरितं किञ्चिद्ब्रह्मनिष्ठस्य देहिनः ।
सत्यपूतस्य शुद्धस्य सर्वप्राणिहितस्य च ।
को वोपद्रवमन्विच्छेदात्मापघातकं विना ॥२८॥
na tasya duritaṃ kiñcidbrahmaniṣṭhasya dehinaḥ |
satyapūtasya śuddhasya sarvaprāṇihitasya ca |
ko vopadravamanvicchedātmāpaghātakaṃ vinā ||28||
ब्रह्म में निष्ठावान्, सत्य से पूत, शुद्ध, समस्त प्राणियों के हितकारी उस देही का कोई दुरित (अनिष्ट) नहीं होता; और अपना घात करने वाले को छोड़कर, कौन उस पर उपद्रव करना चाहेगा?