The Great Liberation Tantra· 3.120 / 153

The Great Liberation Tantra3.120

3.120
सर्वं ब्रह्ममयं देवि भावयेत् ब्रह्मसाधकः । न चाऽस्य प्रत्यवायोऽस्ति नाङ्गवैगुण्यमेव च । महामनोः साधने तु व्यङ्गं साङ्गायते ध्रुवम् ॥१२०॥
sarvaṃ brahmamayaṃ devi bhāvayet brahmasādhakaḥ | na cā'sya pratyavāyo'sti nāṅgavaiguṇyameva ca | mahāmanoḥ sādhane tu vyaṅgaṃ sāṅgāyate dhruvam ||120||
— सब कुछ ; — ब्रह्ममय ; — हे देवि ; — भावित करे ; — ब्रह्म-साधक ; — नहीं ; — और उसके लिए ; — प्रत्यवाय नहीं है ; — अंग-वैगुण्य नहीं ; — निश्चय ही ; — और ; — महामन्त्र के ; — साधन में ; — निश्चय ही ; — विकलांग (अधूरा कर्म) ; — सांग (पूर्ण) हो जाता है ; — निश्चय ही

हे देवि, ब्रह्म-साधक सब कुछ ब्रह्ममय भावित करे; और उसके लिए न प्रत्यवाय है, न अंग-वैगुण्य (अंगों की त्रुटि)। महामन्त्र के साधन में विकलांग (अधूरा कर्म) भी निश्चय ही सांग (पूर्ण) हो जाता है।