Vijñāna Bhairava Tantra · 1.6

Vijñāna Bhairava Tantra 1.6

1.6
न हि वर्णविभेदेन देहभेदेन वा भवेत् । परत्वं निष्कलत्वेन सकलत्वे न तद्भवेत् ॥६॥
na hi varṇavibhedena dehabhedena vā bhavet | paratvaṃ niṣkalatvena sakalatve na tad bhavet
anuṣṭubh
— क्योंकि नहीं (अव्यय) ; — वर्णों/रंगों के भेद से (करण कारक — समासगत) ; — देहों के भेद से (करण कारक — समासगत) ; — अथवा (अव्यय) ; — हो सकता है (विधि लिङ्) ; — परत्व, सर्वोच्चता (कर्ता कारक) ; — निष्कलत्व (निरंशता) से (करण कारक) ; — सकलत्व (अंशयुक्तता) में (अधिकरण कारक) ; — वह नहीं हो सकता

वर्ण-भेद से अथवा देह-भेद से परत्व सम्भव नहीं है; निष्कल (निरंश) होने से ही परत्व है — सकल (सावयव) अवस्था में वह नहीं हो सकता।