Vijñāna Bhairava Tantra · 1.7

Vijñāna Bhairava Tantra 1.7

1.7
प्रसादं कुरु मे नाथ निःशेषं छिन्धि संशयम् । भैरव उवाच साधु साधु त्वया पृष्टं तन्त्रसारमिदं प्रिये ॥७॥
prasādaṃ kuru me nātha niḥśeṣaṃ chindhi saṃśayam | bhairava uvāca sādhu sādhu tvayā pṛṣṭaṃ tantrasāram idaṃ priye
anuṣṭubh
— प्रसाद, कृपा (कर्म कारक) ; — कीजिए, करें (आज्ञार्थ, अन्य पुरुष एकवचन) ; — मुझ पर, मेरे लिए (षष्ठी/सम्प्रदान) ; — हे नाथ! (सम्बोधन) ; — निःशेष, पूर्णतः (क्रियाविशेषण) ; — काट दीजिए (आज्ञार्थ — √छिद्) ; — संशय को (कर्म कारक) ; — भैरव बोले (परोक्ष भूत) ; — साधु, साधु! — उत्तम, उत्तम! (प्रशंसा-वचन) ; — तुम्हारे द्वारा पूछा गया (कर्मवाच्य भूत कृदन्त) ; — तन्त्र का सार (कर्ता कारक — समासगत) ; — यह, हे प्रिये! (कर्ता कारक + सम्बोधन)

हे नाथ! मुझ पर प्रसाद करें, मेरे संशय को निःशेष काट दें। (तब) भैरव बोले — हे प्रिये! साधु, साधु! तुमने जो पूछा है वह तन्त्र का सार ही है।