Vijñāna Bhairava Tantra · 1.8

Vijñāna Bhairava Tantra 1.8

1.8
गुह्यातिगुह्यगोप्तृ त्वं यद्यपीदं वरानने । तथापि कथयिष्यामि यथा वेत्सि तथा शृणु ॥८॥
guhyātiguhyagoptṛ tvaṃ yadyapīdaṃ varānane | tathāpi kathayiṣyāmi yathā vetsi tathā śṛṇu
anuṣṭubh
— हे गुह्य से भी अति-गुह्य के गोप्ता! (सम्बोधन — समासगत) ; — तुम (कर्ता कारक) ; — यद्यपि (अव्यय-युग्म) ; — यह (कर्ता/कर्म कारक नपुंसक) ; — हे वरानने! (सुन्दरमुखी, सम्बोधन) ; — तथापि, फिर भी (अव्यय-युग्म) ; — मैं कहूँगा (भविष्यत् काल, उत्तम पुरुष एकवचन) ; — जैसा, जिस प्रकार (सम्बन्धवाचक अव्यय) ; — तुम जानती हो (वर्तमान, मध्यम पुरुष एकवचन — √विद्) ; — वैसा सुनो (आज्ञार्थ, मध्यम पुरुष एकवचन)

हे वरानने (सुन्दरमुखी)! यद्यपि यह (तत्त्व) अति-गुह्य के भी गोप्ता (परम रहस्य का संरक्षक) है, फिर भी मैं उसे कहूँगा — तुम जैसा जानने योग्य हो वैसा सुनो।