Vijñāna Bhairava Tantra · 1.9

Vijñāna Bhairava Tantra 1.9

1.9
यत्परं निष्कलं देवि सर्वतत्त्वातिगोचरम् । तत्तु शक्यं न तेनेह वक्तुं शक्यं तदिच्छया ॥९॥
yat paraṃ niṣkalaṃ devi sarvatattvātigocaram | tat tu śakyaṃ na teneha vaktuṃ śakyaṃ tad icchayā
anuṣṭubh
— जो (सम्बन्धवाचक सर्वनाम, कर्ता कारक नपुंसक) ; — परम, सर्वोच्च (विशेषण) ; — निष्कल, अंश-रहित (विशेषण) ; — हे देवि! (सम्बोधन) ; — समस्त तत्त्वों के परे, अगोचर (समासगत विशेषण) ; — वह सचमुच नहीं किया जा सकता ; — उसके द्वारा (करण कारक) ; — यहाँ, इस लोक में, शब्दों में (अव्यय) ; — कहने के लिए (तुमुन्नन्त) ; — वह शक्य है — कहा जा सकता है ; — इच्छा से (करण कारक)

हे देवि! जो परम है, निष्कल है, और समस्त तत्त्वों के अगोचर (परे) है — वह वस्तुतः किसी के द्वारा यहाँ (शब्दों में) कहा नहीं जा सकता; वह केवल (शुद्ध) इच्छा से ही (अनुभूत होने में) शक्य है।