yat paraṃ niṣkalaṃ devi sarvatattvātigocaram |
tat tu śakyaṃ na teneha vaktuṃ śakyaṃ tad icchayā
anuṣṭubh
— जो (सम्बन्धवाचक सर्वनाम, कर्ता कारक नपुंसक); — परम, सर्वोच्च (विशेषण); — निष्कल, अंश-रहित (विशेषण); — हे देवि! (सम्बोधन); — समस्त तत्त्वों के परे, अगोचर (समासगत विशेषण); — वह सचमुच नहीं किया जा सकता; — उसके द्वारा (करण कारक); — यहाँ, इस लोक में, शब्दों में (अव्यय); — कहने के लिए (तुमुन्नन्त); — वह शक्य है — कहा जा सकता है; — इच्छा से (करण कारक)
हे देवि! जो परम है, निष्कल है, और समस्त तत्त्वों के अगोचर (परे) है — वह वस्तुतः किसी के द्वारा यहाँ (शब्दों में) कहा नहीं जा सकता; वह केवल (शुद्ध) इच्छा से ही (अनुभूत होने में) शक्य है।