आसने शयने स्थित्वा निराधारं विभावयन् ।
स्वदेहं मनसि क्षीणे क्षणात्क्षीणाशयो भवेत् ॥११७॥
āsane śayane sthitvā nirādhāraṃ vibhāvayan |
svadehaṃ manasi kṣīṇe kṣaṇāt kṣīṇāśayo bhavet
anuṣṭubh
[पुनरुक्ति — श्लोक ६५] आसन या शय्या पर अपने देह को निराधार भावना करे; मन के क्षीण होने पर क्षण-भर में क्षीण-आशय (वासना-मुक्त) हो जाता है।