Vijñāna Bhairava Tantra · 1.117

Vijñāna Bhairava Tantra 1.117

1.117
आसने शयने स्थित्वा निराधारं विभावयन् । स्वदेहं मनसि क्षीणे क्षणात्क्षीणाशयो भवेत् ॥११७॥
āsane śayane sthitvā nirādhāraṃ vibhāvayan | svadehaṃ manasi kṣīṇe kṣaṇāt kṣīṇāśayo bhavet
anuṣṭubh
— निराधार के रूप में अपने देह (कर्म कारक — समासगत) ; — मन के क्षीण होने पर (सति-सप्तमी) ; — क्षीण-आशय, वासना-मुक्त (कर्ता — समासगत)

[पुनरुक्ति — श्लोक ६५] आसन या शय्या पर अपने देह को निराधार भावना करे; मन के क्षीण होने पर क्षण-भर में क्षीण-आशय (वासना-मुक्त) हो जाता है।