Vijñāna Bhairava Tantra · 1.116

Vijñāna Bhairava Tantra 1.116

1.116
मध्यजिह्वे स्फारितास्ये मध्ये निक्षिप्य चेतनाम् । होच्चारं मनसा कुर्वंस्ततः शान्ते प्रलीयते ॥११६॥
madhyajihve sphāritāsye madhye nikṣipya cetanām | hoccāraṃ manasā kurvaṃs tataḥ śānte pralīyate
anuṣṭubh
— जिह्वा के मध्य में रखकर (अधिकरण — समासगत) ; — 'ह'-उच्चारण (कर्म कारक — समासगत) ; — शान्त (भैरव) में (अधिकरण कारक)

[पुनरुक्ति — श्लोक ६४] जिह्वा को मध्य में रखकर, मुख विस्तृत खोलकर, मध्य में चेतना को निक्षेपित करके, मानसिक रूप से 'ह'-उच्चारण करते हुए (साधक) शान्त (भैरव) में प्रलीन हो जाता है।