चलासने स्थितस्याथ शनैर्वा देहचालनात् ।
प्रशान्ते मानसे भावे देवि दिव्यौघमाप्नुयात् ॥११८॥
calāsane sthitasyātha śanair vā dehacālanāt |
praśānte mānase bhāve devi divyaughamāpnuyāt
anuṣṭubh
[पुनरुक्ति — श्लोक ६६] चलते आसन पर बैठकर, या धीरे-धीरे देह को हिलाने से, मानसिक भाव के प्रशान्त होने पर (साधक) दिव्य-ओघ प्राप्त करता है।