Vijñāna Bhairava Tantra · 1.118

Vijñāna Bhairava Tantra 1.118

1.118
चलासने स्थितस्याथ शनैर्वा देहचालनात् । प्रशान्ते मानसे भावे देवि दिव्यौघमाप्नुयात् ॥११८॥
calāsane sthitasyātha śanair vā dehacālanāt | praśānte mānase bhāve devi divyaughamāpnuyāt
anuṣṭubh
— चलते (हिलते) आसन पर (अधिकरण — समासगत) ; — देह को हिलाने से (अपादान — समासगत) ; — दिव्य-ओघ (दिव्य प्रवाह) — कर्म कारक — समासगत

[पुनरुक्ति — श्लोक ६६] चलते आसन पर बैठकर, या धीरे-धीरे देह को हिलाने से, मानसिक भाव के प्रशान्त होने पर (साधक) दिव्य-ओघ प्राप्त करता है।