The Essence of the Tantra· 9.48 / 53

The Essence of the Tantra9.48

9.48

एतद् एव अवस्थाचतुष्टयं पिण्डस्थपदस्थरूपस्थरूपातीतशब्दैर् योगिनो व्यवहरन्ति प्रसङ्ख्यानधनास् तु सर्वतोभद्रं व्याप्तिः महाव्याप्तिः प्रचय इति शब्दैः

Transliteration (IAST)

etad eva avasthācatuṣṭayaṃ piṇḍasthapadastharūpastharūpātītaśabdair yogino vyavaharanti prasaṅkhyānadhanās tu sarvatobhadraṃ vyāptiḥ mahāvyāptiḥ pracaya iti śabdaiḥ

— अवस्था-चतुष्टय (चार अवस्थाएँ) ; — 'पिण्डस्थ', 'पदस्थ', 'रूपस्थ', 'रूपातीत' शब्दों से ; — योगी ; — व्यवहृत करते हैं, कहते हैं ; — प्रसंख्यान-धन (ध्यान-सम्पन्न जन) ; — सर्वतोभद्र — सब ओर से शुभ ; — व्याप्ति — व्यापन ; — महाव्याप्ति — महान् व्यापन ; — प्रचय — संचय, राशि

इसी अवस्था-चतुष्टय को योगी 'पिण्डस्थ', 'पदस्थ', 'रूपस्थ' एवं 'रूपातीत' शब्दों से व्यवहृत करते हैं; किन्तु प्रसंख्यान-धन (ध्यान-सम्पन्न) 'सर्वतोभद्र', 'व्याप्ति', 'महाव्याप्ति' एवं 'प्रचय' शब्दों से।