The Essence of the Tantra· 9.44 / 53

The Essence of the Tantra9.44

9.44

यदा तु तत्रैव अधिष्ठानरूपतया भानं सङ्कल्पः तदा स्वप्नावस्था

Transliteration (IAST)

yadā tu tatraiva adhiṣṭhānarūpatayā bhānaṃ saṅkalpaḥ tadā svapnāvasthā

— उसी (त्रितय) में ; — अधिष्ठान-रूप से (आधार-भूमि रूप से) ; — भान — प्रतीति ; — संकल्प — कल्पना ; — स्वप्न-अवस्था

किन्तु जब उसी (त्रितय) में अधिष्ठान-रूप से भान होता है — संकल्प — तब स्वप्न-अवस्था (होती है)।