The Essence of the Tantra· 9.17 / 53

The Essence of the Tantra9.17

9.17

तावत्य् उद्रिक्तरागादिकञ्चुकस्य सकलस्य प्रमातृत्वात् सकलस्यापि एवं पाञ्चदश्यं तस्यापि तावद् वेद्यत्वात्

Transliteration (IAST)

tāvaty udriktarāgādikañcukasya sakalasya pramātṛtvāt sakalasyāpi evaṃ pāñcadaśyaṃ tasyāpi tāvad vedyatvāt

— उतने तक (उतनी सीमा तक) ; — उद्रिक्त राग आदि कञ्चुक वाले ; — सकल की ; — प्रमातृत्व होने के कारण ; — सकल की भी इस प्रकार पाञ्चदश्य (पन्द्रह-रूपता) ; — वह भी उतने तक वेद्य होने के कारण

उतने तक उद्रिक्त राग आदि कञ्चुक वाले सकल की प्रमातृता होने के कारण, सकल की भी इस प्रकार पाञ्चदश्य (पन्द्रह-रूपता) है, क्योंकि वह भी उतने तक वेद्य है।