The Essence of the Tantra· 9.12 / 53

The Essence of the Tantra9.12

9.12

तदुपरागकृतश् च शक्तिमत्सु प्रमातृषु भेदः करणभेदस्य कर्तृभेदपर्यवसानात् शक्तेर् एव च अव्यतिरिक्तायाः करणीकर्तुं शक्यत्वात् न अन्यस्य अनवस्थाद्यापत्तेः

Transliteration (IAST)

taduparāgakṛtaś ca śaktimatsu pramātṛṣu bhedaḥ karaṇabhedasya kartṛbhedaparyavasānāt śakter eva ca avyatiriktāyāḥ karaṇīkartuṃ śakyatvāt na anyasya anavasthādyāpatteḥ

— उसके उपराग (तिंगन/रञ्जन) से उत्पन्न ; — शक्तिमान् प्रमाताओं में ; — भेद ; — करण-भेद का ; — कर्तृ-भेद में पर्यवसान होने के कारण ; — (धारक से) अव्यतिरिक्त शक्ति का ; — करण बनाया जा सकने के कारण ; — अन्य का नहीं ; — (अन्यथा) अनवस्था आदि का प्रसंग आने के कारण

और उसके उपराग (तिंगन) से शक्तिमान् प्रमाताओं में भेद (होता है), क्योंकि करण-भेद कर्तृ-भेद में पर्यवसित होता है; और (अपने धारक से) अव्यतिरिक्त शक्ति को ही करण बनाया जा सकता है, अन्य को नहीं, क्योंकि (अन्यथा) अनवस्था आदि का प्रसंग आ जायेगा।