The Essence of the Tantra· 8.5 / 93

The Essence of the Tantra8.5

8.5

तत्र पारमार्थिक एतावान् कार्यकारणभावो यद् उत कर्तृस्वभावस्य स्वतन्त्रस्य भगवत एवंविधेन शिवादिधरान्तेन वपुषा स्वरूपभिन्नेन स्वरूपविश्रान्तेन च प्रथनम्

Transliteration (IAST)

tatra pāramārthika etāvān kāryakāraṇabhāvo yad uta kartṛsvabhāvasya svatantrasya bhagavata evaṃvidhena śivādidharāntena vapuṣā svarūpabhinnena svarūpaviśrāntena ca prathanam

— कर्तृ-स्वभाव वाले (जिसका स्वभाव कर्ता होना है) ; — स्वतन्त्र (भगवान्) का ; — भगवान् का ; — शिव से धरा-पर्यन्त रूप से ; — वपु (शरीर/रूप) से ; — स्वरूप से भिन्न ; — स्वरूप में विश्रान्त ; — प्रथन — प्रकटन, प्रदर्शन

उनमें पारमार्थिक कार्य-कारण-भाव इतना ही है — कि कर्तृ-स्वभाव वाले स्वतन्त्र भगवान् का इस प्रकार के शिव से लेकर धरा-पर्यन्त, स्वरूप से भिन्न तथा स्वरूप में विश्रान्त वपु (शरीर) से प्रथन (प्रकटन)।