The Essence of the Tantra· 8.6 / 93

The Essence of the Tantra8.6

8.6

कल्पितस् तु कार्यकारणभावः परमेशेच्छया नियतिप्राणया निर्मितः स च यावति यदा नियतपौर्वापर्यावभासनं सत्य् अपि अधिके स्वरूपानुगतम् एतावत्य् एव तेन योगीच्छातो ऽपि अङ्कुरो बीजाद् अपि स्वप्नादौ घटादेर् अपीति

Transliteration (IAST)

kalpitas tu kāryakāraṇabhāvaḥ parameśecchayā niyatiprāṇayā nirmitaḥ sa ca yāvati yadā niyatapaurvāparyāvabhāsanaṃ saty api adhike svarūpānugatam etāvaty eva tena yogīcchāto 'pi aṅkuro bījād api svapnādau ghaṭāder apīti

— कल्पित (व्यावहारिक) ; — परमेश-इच्छा से ; — नियति-प्राण — जिसका प्राण नियति है ; — निर्मित, उत्पादित ; — नियत पौर्वापर्य (पूर्व-पश्चात् क्रम) का अवभासन ; — स्वरूप-अनुगत — (कारण के) स्वभाव के अनुरूप ; — योगी की इच्छा से ; — अंकुर ; — बीज से

किन्तु कल्पित कार्य-कारण-भाव नियति-प्राण (जिसका प्राण नियति है) परमेश-इच्छा से निर्मित है। और वह जितने (विस्तार) में, जब, नियत पौर्वापर्य (पूर्व-पश्चात् क्रम) का अवभासन (होता है) — अधिक रहने पर भी स्वरूप-अनुगत उतना ही (होता है) — उससे योगी की इच्छा से भी अंकुर, बीज से भी, स्वप्न आदि में घट आदि से भी (उत्पन्न होता है)।