The Essence of the Tantra· 6.48 / 82

The Essence of the Tantra6.48

6.48

अत्र प्राणो जगत् सृजति तावती रात्रिः यत्र प्राणप्रशमः प्राणे च ब्रह्मबिलधाम्नि शान्ते ऽपि या संवित् तत्राप्य् अस्ति क्रमः

Transliteration (IAST)

atra prāṇo jagat sṛjati tāvatī rātriḥ yatra prāṇapraśamaḥ prāṇe ca brahmabiladhāmni śānte 'pi yā saṃvit tatrāpy asti kramaḥ

— प्राण ; — जगत् ; — सृजित करता है ; — रात्रि ; — प्राण का प्रशम (शान्ति) ; — ब्रह्म-बिल-धाम में (ब्रह्म-रन्ध्र के धाम में) ; — शान्त हो जाने पर भी ; — संवित् — चैतन्य ; — क्रम — अनुक्रम

यहाँ प्राण जगत् को सृजित करता है, उतनी ही रात्रि, जिसमें प्राण का प्रशम (शान्ति) होती है। और ब्रह्म-बिल-धाम में प्राण के शान्त हो जाने पर भी जो संवित् रहती है, वहाँ भी क्रम है।