The Essence of the Tantra· 6.13 / 82

The Essence of the Tantra6.13

6.13

तत्र वेद्यमयताप्रकाशो दिनं वेद्यस्य विचारयितरि लयो रात्रिः ते च प्रकाशविश्रान्ती चिराचिरवैचित्र्यात् अनन्तभेदे तत्साम्ये तु विषुवत्

Transliteration (IAST)

tatra vedyamayatāprakāśo dinaṃ vedyasya vicārayitari layo rātriḥ te ca prakāśaviśrāntī cirāciravaicitryāt anantabhede tatsāmye tu viṣuvat

— वेद्यमयता का प्रकाश — ज्ञेय-रूप अभिव्यक्ति ; — दिन ; — वेद्य का (ज्ञेय का) ; — विचारयिता में (प्रमाता में) ; — लय — विलय, विलीनता ; — रात्रि ; — प्रकाश और विश्रान्ति ; — चिर-अचिर (दीर्घ-अल्प) की विचित्रता से ; — अनन्त भेद में ; — उन दोनों की समता होने पर ; — विषुवत् — विषुव

उसमें वेद्यमयता का प्रकाश दिन है; वेद्य का विचारयिता (प्रमाता) में लय रात्रि है। और ये प्रकाश-विश्रान्ति चिर-अचिर (दीर्घ-अल्प) की विचित्रता से अनन्त भेद वाले हैं; किन्तु उन दोनों की समता होने पर विषुवत् (विषुव) होता है।