The Essence of the Tantra· 5.7 / 43

The Essence of the Tantra5.7

5.7

एवम् अस्य अनवरतं ध्यायिनः स्वसंविन्मात्रपरमार्थान् सृष्टिस्थितिसंहारप्रबन्धान् सृष्ट्यादिस्वातन्त्र्यपरमार्थत्वं च स्वसंविदो निश्चिन्वतः सद्य एव भैरवीभावः

Transliteration (IAST)

evam asya anavarataṃ dhyāyinaḥ svasaṃvinmātraparamārthān sṛṣṭisthitisaṃhāraprabandhān sṛṣṭyādisvātantryaparamārthatvaṃ ca svasaṃvido niścinvataḥ sadya eva bhairavībhāvaḥ

— निरन्तर, अविच्छिन्न रूप से ; — जिनका परमार्थ स्व-संविन्मात्र है ; — सृष्टि-स्थिति-संहार के प्रबन्ध ; — सृष्टि आदि का परमार्थत्व (अपनी संवित् का) स्वातन्त्र्य है ; — निश्चित करने वाले का ; — तत्काल ही भैरवी-भाव

इस प्रकार निरन्तर ध्यान करने वाले, तथा सृष्टि-स्थिति-संहार के प्रबन्धों को स्व-संविन्मात्र-परमार्थ रूप, एवं सृष्टि आदि के परमार्थत्व को अपनी ही संवित् का स्वातन्त्र्य — ऐसा निश्चित करने वाले (साधक) को तत्काल ही भैरवी-भाव (की प्राप्ति) होती है।