The Essence of the Tantra· 4.42 / 46

The Essence of the Tantra4.42

4.42

न अतिरहस्यम् एकत्र ख्याप्यं न च सर्वथा गोप्यम् इति हि अस्मद्गुरवः

Transliteration (IAST)

na atirahasyam ekatra khyāpyaṃ na ca sarvathā gopyam iti hi asmadguravaḥ

— अति-रहस्य (गुह्यतम उपदेश) ; — एक स्थान पर प्रकट करने योग्य ; — सर्वथा गोपनीय ; — हमारे गुरु (ऐसा कहते हैं)

क्योंकि हमारे गुरु (कहते हैं) — 'अति-रहस्य न एक स्थान पर ही प्रकट करने योग्य है, और न सर्वथा गोपनीय।'