The Essence of the Tantra· 4.43 / 46

The Essence of the Tantra4.43

4.43

तद् एवम् यद् उक्तं यागहोमादि तत् एवंविधे महेश्वर एव मन्तव्यम्

Transliteration (IAST)

tad evam yad uktaṃ yāgahomādi tat evaṃvidhe maheśvara eva mantavyam

— याग, होम आदि ; — इस प्रकार के महेश्वर के विषय में ; — मन्तव्य — समझने योग्य

अतः इस प्रकार जो याग, होम आदि कहे गये, वे इस प्रकार के महेश्वर के विषय में ही मन्तव्य (समझने योग्य) हैं।