The Essence of the Tantra· 22.23 / 53

The Essence of the Tantra22.23

22.23

तद्युगलमूर्ध्वधामप्रवेशसस्पन्दजातसङ्क्षोभम् । क्षुभ्नात्य् अनुचक्राण्य् अपि तानि तदा तन्मयानि न पृथक् तु

Transliteration (IAST)

tadyugalamūrdhvadhāmapraveśasaspandajātasaṅkṣobham | kṣubhnāty anucakrāṇy api tāni tadā tanmayāni na pṛthak tu

— वह युगल ; — ऊर्ध्व-धाम में प्रवेश ; — स्पन्द के साथ उत्पन्न संक्षोभ वाला ; — क्षुब्ध कर देता है ; — अनुचक्रों को भी ; — तब उसमें तन्मय ; — पृथक् नहीं

उस युगल के ऊर्ध्व-धाम में प्रवेश से, स्पन्द के साथ उत्पन्न संक्षोभ वाला (वह), अनुचक्रों को भी क्षुब्ध कर देता है; तब वे (अनुचक्र) भी उसमें तन्मय (होकर) पृथक् नहीं (रहते)।