The Essence of the Tantra· 20.23 / 65

The Essence of the Tantra20.23

20.23

तत्र च आधारबलाद् एव अधिकाधिकमन्त्रसिद्धिः भवति इति पूर्वं पूर्वं प्रधानम् आधारगुणानुविधायित्वात् च मन्त्राणां तत्र तत्र साध्ये तत्तत्प्रधानम् इति शास्त्रगुरवः

Transliteration (IAST)

tatra ca ādhārabalād eva adhikādhikamantrasiddhiḥ bhavati iti pūrvaṃ pūrvaṃ pradhānam ādhāraguṇānuvidhāyitvāt ca mantrāṇāṃ tatra tatra sādhye tattatpradhānam iti śāstraguravaḥ

— आधार के बल से ही ; — अधिकाधिक मन्त्र-सिद्धि ; — पूर्व-पूर्व (सूची में पहले-पहले) प्रधान ; — आधार के गुणों के अनुविधायी (अनुरूप) होने के कारण ; — मन्त्रों के ; — उस-उस साध्य के विषय में ; — वह-वह प्रधान ; — शास्त्र-गुरु (कहते हैं)

और वहाँ आधार के बल से ही अधिकाधिक मन्त्र-सिद्धि होती है — अतः पूर्व-पूर्व प्रधान है। और मन्त्र आधार के गुणों के अनुविधायी (अनुरूप) होने से, उस-उस साध्य के विषय में वह-वह प्रधान है — ऐसा शास्त्र-गुरु (कहते हैं)।