The Essence of the Tantra· 20.22 / 65

The Essence of the Tantra20.22

20.22

तत्र गुरुदेहं स्वदेहं शक्तिदेहं रहस्यशास्त्रपुस्तकं वीरपात्रम् अक्षसूत्रं प्राहरणं बाणीयं मौक्तिकं सौवर्णं पुष्पगन्धद्रव्यादिहृद्यवस्तुकृतं मकुरं वा लिङ्गम् अर्चयेत्

Transliteration (IAST)

tatra gurudehaṃ svadehaṃ śaktidehaṃ rahasyaśāstrapustakaṃ vīrapātram akṣasūtraṃ prāharaṇaṃ bāṇīyaṃ mauktikaṃ sauvarṇaṃ puṣpagandhadravyādihṛdyavastukṛtaṃ makuraṃ vā liṅgam arcayet

— गुरु-देह ; — स्व-देह (अपना शरीर) ; — शक्ति-देह (अनुष्ठान-सहचरी का शरीर) ; — रहस्य-शास्त्र-पुस्तक ; — वीर-पात्र ; — अक्ष-सूत्र (जप-माला) ; — प्रहरण (आयुध), बाण ; — मौक्तिक (मोती), सौवर्ण (स्वर्णमय वस्तु) ; — पुष्प-गन्ध-द्रव्य आदि हृद्य वस्तुओं से बना ; — अथवा मकुर (दर्पण) — (किसी को भी) लिङ्ग रूप में अर्चित करे

वहाँ गुरु-देह, स्व-देह, शक्ति-देह, रहस्य-शास्त्र-पुस्तक, वीर-पात्र, अक्ष-सूत्र (माला), प्रहरण (आयुध), बाण, मौक्तिक (मोती), सौवर्ण (स्वर्णमय वस्तु), पुष्प-गन्ध-द्रव्य आदि हृद्य (मनोहर) वस्तुओं से बना, अथवा मकुर (दर्पण) — (इनमें से किसी को भी) लिङ्ग रूप में अर्चित करे।