The Essence of the Tantra· 13.97 / 101

The Essence of the Tantra13.97

13.97

मन्त्रहृदयम् अनवरतं स्मरेत् इत्य् एवं शिष्यः श्रुत्वा प्रणम्य अभ्युपगम्य गुरुं धनदारशरीरपर्यन्तया दक्षिणया परितोष्य पूर्वदीक्षितांश् च दीनानाथादिकान् तर्पयेत्

Transliteration (IAST)

mantrahṛdayam anavarataṃ smaret ity evaṃ śiṣyaḥ śrutvā praṇamya abhyupagamya guruṃ dhanadāraśarīraparyantayā dakṣiṇayā paritoṣya pūrvadīkṣitāṃś ca dīnānāthādikān tarpayet

— मन्त्र-हृदय (मन्त्र का सार) ; — निरन्तर स्मरण करे ; — सुनकर, प्रणाम कर, स्वीकार कर ; — धन, दार (पत्नी) एवं शरीर-पर्यन्त दक्षिणा से ; — (गुरु को) परितुष्ट कर ; — पहले दीक्षित जनों को ; — दीन, अनाथ आदि को ; — तृप्त करे (दान से)

मन्त्र-हृदय का निरन्तर स्मरण करे। इस प्रकार शिष्य, सुनकर, प्रणाम कर, स्वीकार कर, धन, दार (पत्नी) एवं शरीर-पर्यन्त दक्षिणा से गुरु को परितुष्ट कर, पहले दीक्षित जनों को तथा दीन, अनाथ आदि को भी तृप्त करे।