The Essence of the Tantra· 13.62 / 101

The Essence of the Tantra13.62

13.62

ततो यथाशक्ति हुत्वा स्रुक्स्रुवौ ऊर्ध्वाधोमुखतया शक्तिशिवरूपौ परस्परोन्मुखौ विधाय समपादोत्थितो द्वादशान्तगगनोदितशिवपूर्णचन्द्रनिःसृतपतत्परामृतधाराभावनां कुर्वन् वौषडन्तं मन्त्रम् उच्चारयन् च आज्यक्षयान्तं तिष्ठेत् इति पूर्णाहुतिः मन्त्रचक्रसन्तर्पणी

Transliteration (IAST)

tato yathāśakti hutvā sruksruvau ūrdhvādhomukhatayā śaktiśivarūpau parasparonmukhau vidhāya samapādotthito dvādaśāntagaganoditaśivapūrṇacandraniḥsṛtapatatparāmṛtadhārābhāvanāṃ kurvan vauṣaḍantaṃ mantram uccārayan ca ājyakṣayāntaṃ tiṣṭhet iti pūrṇāhutiḥ mantracakrasantarpaṇī

— यथाशक्ति आहुति देकर ; — स्रुक्-स्रुव (दो आहुति-पात्र) ; — ऊर्ध्व-अधोमुख रूप से (क्रमशः) ; — शक्ति-शिव-रूप ; — परस्पर उन्मुख ; — सम-पाद से उत्थित (खड़ा होकर) ; — द्वादशान्त-गगन में उदित शिव-पूर्ण-चन्द्र से निःसृत पतित परम-अमृत-धारा की भावना ; — 'वौषट्'-अन्त मन्त्र ; — आज्य-क्षय-पर्यन्त (घी समाप्त होने तक) ; — पूर्णाहुति ; — मन्त्र-चक्र का सन्तर्पण करने वाली

फिर यथाशक्ति आहुति देकर, स्रुक्-स्रुव को ऊर्ध्व-अधोमुख रूप से शक्ति-शिव-रूप, परस्पर उन्मुख कर, सम-पाद से उत्थित होकर, द्वादशान्त-गगन में उदित शिव-पूर्ण-चन्द्र से निःसृत पतित होती परम-अमृत-धारा की भावना करता हुआ, 'वौषट्'-अन्त मन्त्र का उच्चारण करता हुआ, आज्य-क्षय-पर्यन्त स्थित रहे — यह पूर्णाहुति है, जो मन्त्र-चक्र का सन्तर्पण करती है।