The Essence of the Tantra· 13.31 / 101

The Essence of the Tantra13.31

13.31

तावत् हि तद् अतरङ्गं भैरववपुः यत् स्वात्मनि अवभासितसृष्टिसंहारावैचित्र्यकोटि

Transliteration (IAST)

tāvat hi tad ataraṅgaṃ bhairavavapuḥ yat svātmani avabhāsitasṛṣṭisaṃhārāvaicitryakoṭi

— अतरंग — निस्तरंग (तरंग-रहित) ; — भैरव-वपु (भैरव का शरीर) ; — अपने आत्मा में ; — जिसमें सृष्टि-संहार की वैचित्र्य-कोटि अवभासित होती है

(उत्तर:) वह अतरंग भैरव-वपु (शरीर) वही है जिसमें अपने आत्मा में सृष्टि-संहार की वैचित्र्य-कोटि अवभासित होती है।