The Essence of the Tantra· 13.30 / 101

The Essence of the Tantra13.30

13.30

यद् आहुः अतरङ्गरूढौ लब्धायां पुनः किं तत्त्वसृष्टिर् न्यासादिना इति

Transliteration (IAST)

yad āhuḥ ataraṅgarūḍhau labdhāyāṃ punaḥ kiṃ tattvasṛṣṭir nyāsādinā iti

— जो (कोई) कहते हैं ; — अतरंग (निस्तरंग) रूढ़ि में ; — प्राप्त हो जाने पर ; — तत्त्व-सृष्टि — तत्त्वों का सृजन ; — न्यास आदि से

जो (कोई) कहते हैं — 'अतरंग (निस्तरंग) रूढ़ि के प्राप्त हो जाने पर पुनः न्यास आदि से तत्त्व-सृष्टि का क्या (प्रयोजन)?' —