यद् आहुः अतरङ्गरूढौ लब्धायां पुनः किं तत्त्वसृष्टिर् न्यासादिना इति
Transliteration (IAST)
yad āhuḥ ataraṅgarūḍhau labdhāyāṃ punaḥ kiṃ tattvasṛṣṭir nyāsādinā iti
जो (कोई) कहते हैं — 'अतरंग (निस्तरंग) रूढ़ि के प्राप्त हो जाने पर पुनः न्यास आदि से तत्त्व-सृष्टि का क्या (प्रयोजन)?' —