The Essence of the Tantra· 13.32 / 101

The Essence of the Tantra13.32

13.32

एवम् अन्योन्यमेलकयोगेन परमेश्वरीभूतं प्राणदेहबुद्ध्यादि भावयित्वा बहिर् अन्तः पुष्पधूपतर्पणाद्यैर् यथासम्भवं पूजयेत्

Transliteration (IAST)

evam anyonyamelakayogena parameśvarībhūtaṃ prāṇadehabuddhyādi bhāvayitvā bahir antaḥ puṣpadhūpatarpaṇādyair yathāsambhavaṃ pūjayet

— अन्योन्य-मेलक के योग से (पारस्परिक मिलन के योग से) ; — परमेश्वरीभूत — परमेश्वर हो गया ; — प्राण, देह, बुद्धि आदि ; — भावित कर के ; — बाहर-भीतर ; — पुष्प, धूप, तर्पण आदि से ; — यथासम्भव

इस प्रकार अन्योन्य-मेलक के योग से परमेश्वरीभूत प्राण, देह, बुद्धि आदि को भावित कर के, बाहर-भीतर पुष्प, धूप, तर्पण आदि से यथासम्भव पूजा करे।