The Essence of the Tantra· 13.10 / 101

The Essence of the Tantra13.10

13.10

इह हि क्रियाकारकाणां परमेश्वराभेदप्रतिपत्तिदार्ढ्यसिद्धये पूजाक्रिया उदाहरणीकृता तत्र च सर्वकारकाणाम् इत्थं परमेश्वरीभावः तत्र यष्ट्राधारस्य स्थानशुद्ध्यापादानकरणयोर् अर्घपात्रशुद्धिन्यासाभ्याम् यष्टुर् देहन्यासात् याज्यस्य स्थण्डिलादिन्यासात्

Transliteration (IAST)

iha hi kriyākārakāṇāṃ parameśvarābhedapratipattidārḍhyasiddhaye pūjākriyā udāharaṇīkṛtā tatra ca sarvakārakāṇām itthaṃ parameśvarībhāvaḥ tatra yaṣṭrādhārasya sthānaśuddhyāpādānakaraṇayor arghapātraśuddhinyāsābhyām yaṣṭur dehanyāsāt yājyasya sthaṇḍilādinyāsāt

— क्रिया के कारकों का (क्रिया-कारकों का) ; — परमेश्वर के साथ अभेद-प्रतिपत्ति की दृढ़ता की सिद्धि के लिए ; — पूजा-क्रिया को उदाहरण बनाया गया ; — समस्त कारकों का ; — परमेश्वरी-भाव (परमेश्वर हो जाना) ; — यष्टा (पूजक) के आधार का ; — अपादान एवं करण का, स्थान-शुद्धि से ; — अर्घ-पात्र की शुद्धि एवं न्यास से ; — यष्टा (कर्ता, पूजक) का ; — याज्य (पूज्य देवता) का ; — स्थण्डिल आदि के न्यास से

क्योंकि यहाँ क्रिया के कारकों के परमेश्वर के साथ अभेद-प्रतिपत्ति (बोध) की दृढ़ता की सिद्धि के लिए पूजा-क्रिया को उदाहरण बनाया गया है; और वहाँ समस्त कारकों का इस प्रकार परमेश्वरी-भाव (होता है): यष्टा (पूजक) के आधार का स्थान-शुद्धि से, अपादान एवं करण का अर्घ-पात्र की शुद्धि एवं न्यास से, यष्टा (कर्ता) का देह-न्यास से, याज्य (पूज्य) का स्थण्डिल आदि के न्यास से।