The Essence of the Tantra· 12.8 / 10

The Essence of the Tantra12.8

12.8

पुनर् अपि बाह्याभ्यन्तरतया द्वित्वम् बहिरुपास्यमन्त्रतादात्म्येन तन्मयीकृते तत्र तत्र निमज्जनम् इत्य् उक्तम्

Transliteration (IAST)

punar api bāhyābhyantaratayā dvitvam bahirupāsyamantratādātmyena tanmayīkṛte tatra tatra nimajjanam ity uktam

— बाह्य-आभ्यन्तर रूप से ; — द्वित्व — दो-प्रकारता ; — बाहर उपास्य मन्त्र के तादात्म्य से ; — तन्मय किये गये (स्थान) में ; — उस-उस (स्थान) में ; — निमज्जन — निमग्नता, डुबकी

पुनः बाह्य-आभ्यन्तर रूप से द्वित्व (है): बाहर उपास्य मन्त्र के तादात्म्य से तन्मय किये गये उस-उस (स्थान) में निमज्जन — ऐसा कहा गया (वह बाह्य है)।