The Essence of the Tantra· 12.9 / 10

The Essence of the Tantra12.9

12.9

विशेषस् तु आनन्दद्रव्यं वीराधारगतं निरीक्षणेन शिवमयीकृत्य तत्रैव मन्त्रचक्रपूजनम् ततः तेनैव देहप्राणोभयाश्रितदेवताचक्रतर्पणम् इति मुख्यं स्नानम्

Transliteration (IAST)

viśeṣas tu ānandadravyaṃ vīrādhāragataṃ nirīkṣaṇena śivamayīkṛtya tatraiva mantracakrapūjanam tataḥ tenaiva dehaprāṇobhayāśritadevatācakratarpaṇam iti mukhyaṃ snānam

— विशेष — विशिष्ट प्रक्रिया ; — आनन्द-द्रव्य (सांस्कारिक द्रव) ; — वीर के आधार में स्थित ; — निरीक्षण (ध्यान-दृष्टि) से ; — शिवमय कर के ; — मन्त्र-चक्र का पूजन ; — देह एवं प्राण दोनों में आश्रित देवता-चक्र का तर्पण ; — मुख्य स्नान

किन्तु विशेष यह है: वीर के आधार में स्थित आनन्द-द्रव्य को निरीक्षण (ध्यान-दृष्टि) से शिवमय कर के, वहीं मन्त्र-चक्र का पूजन (किया जाता है); फिर उसी (द्रव्य) से देह एवं प्राण — दोनों में आश्रित देवता-चक्र का तर्पण — यह मुख्य स्नान है।