The Essence of the Tantra· 12.10 / 10

The Essence of the Tantra12.10

12.10

आभ्यन्तरं यथा तत्तद्धरादिरूपधारणया तत्र तत्र पार्थिवादौ चक्रे तन्मयीभावः

Transliteration (IAST)

ābhyantaraṃ yathā tattaddharādirūpadhāraṇayā tatra tatra pārthivādau cakre tanmayībhāvaḥ

— आभ्यन्तर (आन्तरिक स्नान) ; — उस-उस धरा आदि रूप की धारणा से ; — उस-उस (स्थान) में ; — पार्थिव आदि चक्र में ; — तन्मयी-भाव — तद्रूप एकात्मता

आभ्यन्तर (स्नान) इस प्रकार है कि उस-उस धरा आदि रूप की धारणा से उस-उस पार्थिव आदि चक्र में तन्मयी-भाव (होता है)।