The Essence of the Tantra· 10.8 / 18

The Essence of the Tantra10.8

10.8

पृथिव्यादिशक्तीनाम् अत्र अवस्थानेन शक्तितत्त्वे यावत् परस्पर्शो विद्यते स्पर्शस्य च सप्रतिघत्वम् इति तावति युक्तम् अण्डत्वम्

Transliteration (IAST)

pṛthivyādiśaktīnām atra avasthānena śaktitattve yāvat parasparśo vidyate sparśasya ca sapratighatvam iti tāvati yuktam aṇḍatvam

— पृथिवी आदि (तत्त्वों) से शक्ति-पर्यन्त की शक्तियों के ; — अवस्थान से (स्थित होने से) ; — शक्ति-तत्त्व में ; — पर-स्पर्श — पारस्परिक स्पर्श ; — सप्रतिघत्व — प्रतिरोध-युक्तता ; — उतने में ; — अण्डत्व (अण्ड होना) युक्त

पृथिवी आदि शक्तियों के यहाँ शक्ति-तत्त्व में अवस्थान से जितना पर-स्पर्श (पारस्परिक स्पर्श) विद्यमान है, और स्पर्श का सप्रतिघत्व (प्रतिरोध-युक्तता) है, उतने में अण्डत्व (अण्ड होना) युक्त है।