The Vision of Śiva· 7.87 / 122

The Vision of Śiva7.87

7.87
सो हि नाम जपो ज्ञेयः सत्यादिस्त्रिविधो हि सः । नमे बन्धो न मे मोक्षस्तौ मलत्वेन संस्थितौ ॥८७॥
so hi nāma japo jñeyaḥ satyādistrividho hi saḥ | name bandho na me mokṣastau malatvena saṃsthitau
— वही निश्चय ; — जप जानने योग्य ; — सत्य आदि (के भेद से) ; — वह निश्चय ही त्रिविध ; — मेरे लिए न बन्ध ; — न मेरे लिए मोक्ष ; — वे दोनों ; — मलत्व (अशुद्धि) के रूप में ; — स्थित

वही जप जानने योग्य है, और वह सत्य (परम सत्ता) आदि (के भेद से) त्रिविध (तीन प्रकार का) है। मेरे लिए न बन्ध है, न मोक्ष; वे दोनों (केवल) मलत्व (अशुद्धि) के रूप में स्थित हैं (न कि सच्चे आत्मा में)।