The Vision of Śiva· 7.86 / 122

The Vision of Śiva7.86

7.86
अभ्यासेनास्मि सोऽप्यत्र जपः परम उच्यते । संकल्पाञ्जनयन्नस्मि स्थितः शब्दानतो मुखे ॥८६॥
abhyāsenāsmi so'pyatra japaḥ parama ucyate | saṃkalpāñjanayannasmi sthitaḥ śabdānato mukhe
— अभ्यास के द्वारा ; — 'मैं वह (शिव) हूँ' ; — भी ; — यहाँ ; — परम जप ; — कहा जाता है ; — संकल्पों को ; — उत्पन्न करता हुआ ; — मैं स्थित हूँ ; — शब्द ; — इससे मुख में

अभ्यास के द्वारा 'मैं वह (शिव) हूँ' यह भी — यहाँ परम जप कहा जाता है; संकल्पों को उत्पन्न करता हुआ मैं स्थित (रहता) हूँ, और इससे (ही) मुख में शब्द (प्रकट होते हैं)।