The Vision of Śiva· 7.85 / 122

The Vision of Śiva7.85

7.85
अनिरुद्धो जपोऽस्त्येव सर्वावस्थास्वसौ जपः । नानाकारैः सदा कुर्वन्नुदयन् सर्ववस्तुगः ॥८५॥
aniruddho japo'styeva sarvāvasthāsvasau japaḥ | nānākāraiḥ sadā kurvannudayan sarvavastugaḥ
— अनिरुद्ध (अबाधित) ; — जप ; — है ही ; — समस्त अवस्थाओं में ; — यह जप ; — नाना आकारों से ; — सदा करते हुए ; — उदित होते हुए ; — समस्त वस्तुओं में व्याप्त

अनिरुद्ध (अबाधित) जप तो है ही; यह जप समस्त अवस्थाओं में (चलता रहता है) — (शिव) नाना आकारों से सदा (कर्म) करते हुए, उदित होते हुए, समस्त वस्तुओं में व्याप्त।