अनिरुद्धो जपोऽस्त्येव सर्वावस्थास्वसौ जपः ।
नानाकारैः सदा कुर्वन्नुदयन् सर्ववस्तुगः ॥८५॥
aniruddho japo'styeva sarvāvasthāsvasau japaḥ |
nānākāraiḥ sadā kurvannudayan sarvavastugaḥ
अनिरुद्ध (अबाधित) जप तो है ही; यह जप समस्त अवस्थाओं में (चलता रहता है) — (शिव) नाना आकारों से सदा (कर्म) करते हुए, उदित होते हुए, समस्त वस्तुओं में व्याप्त।