अत एव शिवः सर्वमिति योगोऽथ चेतसि ।
सन्ततं शक्तिसन्तानप्रसरेण सदैव मे ॥८४॥
ata eva śivaḥ sarvamiti yogo'tha cetasi |
santataṃ śaktisantānaprasareṇa sadaiva me
इसी कारण से 'शिव ही सब कुछ है' इस रूप में योग तब चित्त (मन) में सन्तत (निरन्तर) रहता है — शक्ति-सन्तान (शक्ति की अविच्छिन्न धारा) के प्रसार से वह सदा ही मेरा है।