The Vision of Śiva· 7.84 / 122

The Vision of Śiva7.84

7.84
अत एव शिवः सर्वमिति योगोऽथ चेतसि । सन्ततं शक्तिसन्तानप्रसरेण सदैव मे ॥८४॥
ata eva śivaḥ sarvamiti yogo'tha cetasi | santataṃ śaktisantānaprasareṇa sadaiva me
— इसी कारण से ; — 'शिव ही सब' ; — इस प्रकार ; — योग ; — तब ; — चित्त में ; — सन्तत (निरन्तर) ; — शक्ति-सन्तान (अविच्छिन्न धारा) के प्रसार से ; — सदा ही मेरा

इसी कारण से 'शिव ही सब कुछ है' इस रूप में योग तब चित्त (मन) में सन्तत (निरन्तर) रहता है — शक्ति-सन्तान (शक्ति की अविच्छिन्न धारा) के प्रसार से वह सदा ही मेरा है।