प्रतिपत्त्यानया स्नानं निर्मलीकरणं मतम् ।
दुःखे वापि सुखे वापि सर्वासु प्रतिपत्तिषु ॥८८॥
pratipattyānayā snānaṃ nirmalīkaraṇaṃ matam |
duḥkhe vāpi sukhe vāpi sarvāsu pratipattiṣu
इस प्रतिपत्ति (निश्चय) के द्वारा स्नान निर्मलीकरण (शुद्धि-संपादन) माना गया है — चाहे दु:ख में हो अथवा सुख में, समस्त प्रतीतियों (अनुभूतियों) में (समानरूप से)।