यस्मिन्नर्थे सदात्यागो गच्छतस्तिष्ठतोऽपिवा ।
धावतः खादतो वापि स योगः परयोगिनः ॥८१॥
yasminnarthe sadātyāgo gacchatastiṣṭhato'pivā |
dhāvataḥ khādato vāpi sa yogaḥ parayoginaḥ
जिस-किसी अर्थ (विषय) के विषय में 'मैं शिव हूँ' (इस निश्चय का) सदा अत्याग (अविच्छिन्न धारण) — चलते, खड़े रहते, दौड़ते, अथवा खाते हुए (भी) — वही पर-योगी (श्रेष्ठ योगी) का योग है।