The Vision of Śiva· 7.81 / 122

The Vision of Śiva7.81

7.81
यस्मिन्नर्थे सदात्यागो गच्छतस्तिष्ठतोऽपिवा । धावतः खादतो वापि स योगः परयोगिनः ॥८१॥
yasminnarthe sadātyāgo gacchatastiṣṭhato'pivā | dhāvataḥ khādato vāpi sa yogaḥ parayoginaḥ
— जिस-किसी अर्थ के विषय में ; — सदा अत्याग (अविच्छिन्न धारण) ; — चलते हुए ; — अथवा खड़े रहते हुए ; — दौड़ते हुए ; — अथवा खाते हुए भी ; — वही योग ; — पर-योगी का

जिस-किसी अर्थ (विषय) के विषय में 'मैं शिव हूँ' (इस निश्चय का) सदा अत्याग (अविच्छिन्न धारण) — चलते, खड़े रहते, दौड़ते, अथवा खाते हुए (भी) — वही पर-योगी (श्रेष्ठ योगी) का योग है।